इस मंदिर में भगवान विष्‍णू के दस अवतारों का किया गया वर्णन, की जाती है इने इस स्वरूप की पूजा

इस मंदिर में भगवान विष्‍णू के दस अवतारों का किया गया वर्णन, की जाती है इने इस स्वरूप की पूजा

सैकड़ों वर्ष बाद हिंदुस्तान के केरल प्रदेश के त्रिसूर जिले में गुरुवायुर मंदिर के आसपास के इलाकों का स्वरूप तो बहुत बदल गया है लेकिन कुछ नहीं बदला है वो भगवान के प्रति भक्तों की अटूट श्रद्धा व यही श्रद्धा पीएम को इन मंदिरों तक खींच ला रही है. जो कई शताब्दियों पुराना है व केरल में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है. मंदिर के देवता भगवान गुरुवायुरप्पन हैं जो बालगोपालन कृष्ण भगवान का बालरूप के रूप में हैं. हालांकि गैर-हिन्दुओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं है. कई धर्मों को मानने वाले भगवान गुरूवायूरप्पन के परम भक्त हैं. केरल के गुरुवायुर में स्थित गुरुवायुर मंदिर बाल गोपाल श्री कृष्‍ण का मशहूर हिंदू मंदिर है. ये हिंदुस्तान के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है. यहां भगवान कृष्‍ण की पूजा गुरुवायुरप्‍पन के रूप में की जाती है. मंदिर में भगवान विष्‍णू के दस अवतारों का भी वर्णन किया गया है.

मंदिर से जुड़ी कथा
मान्‍यता है कि इस मंदिर में जिस मूर्ति की स्‍थापना की गई है वह मूर्ति द्वारिका की है. एक बार जब द्वारिका में भयंकर बाढ़ आई तो यह मूर्ति बह गई. देव गुरु बृहस्‍पति को भगवान की ये मूर्ति मिली. उन्‍होंने वायु की सहायता से इस मूर्ति को उपयुक्‍त स्‍थान पर पहुंचा दिया. वायु व बृहस्‍पति ठस मूर्ति की स्‍थापना के लिये एक उपयुक्‍त स्‍थान ढूंढ रहे थे. तभी वह केरल पहुंचे. जहां उन्‍हें माहादेव व माता पार्वती के दर्शन हुये. महादेव के कहने पर बृहस्‍पति व वायु ने उस मूर्ति की स्‍थापना की. गुरु व वायु के नाम पर ही इस मंदिर का नाम गुरुवायुर श्रीकृष्‍ण मंदिर पड़ा. हालांकि इस मंदिर में गैर-हिन्दुओं को प्रवेश की अनुमति नहीं है, फिर भी कई धर्मों अनुयायी भगवान गुरूवायूरप्पन के परम भक्त हैं.

कला व साहित्य से रिश्ता
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इसका रिश्ता केवल धर्म कर्म व पूजा पाठ से ही नहीं बल्कि कला व साहित्य से भी है. ये मंदिर प्रसिद्घ शास्त्रीय नृत्य कला कथकली के विकास में सहायक रही विधा कृष्णनट्टम कली, जोकि नाट्य-नृत्य कला का एक रूप है उसका प्रमुख केन्द्र है. गुरुयावूर मंदिर प्रशासन जो गुरुयावूर देवास्वोम कहलाता है एक कृष्णट्टम संस्थान का संचालन करता है. इसके साथ ही, गुरुयावूर मंदिर का दो मशहूर साहित्यिक कृतियों से भी संबंध है नारायणीयम के लेखक मेल्पथूर नारायण भट्टाथिरी व ज्नानाप्पना के लेखक पून्थानम, दोनों ही गुरुवायुरप्पन के परम भक्त थे.

पहुंचने का मार्ग
यहां पहुंचने के लिए सबसे निकटम मार्ग तिरुच्चूर रेलवे स्टेशन है. दक्षिण रेलवे कोच्चिन हर्बर टरमिनस-पौरण्णुर जंक्शन रेलमार्ग एवं एर्णाकुलम जंक्शन से 75 किलोमीटर दूर त्रिरुच्चूर स्टेशन है. यहां से बत्तीस किलोमीटर दूर है गुरुवायूर मंदिर.