आखिरकार सरकार को क्यों झुकना पड़ा

आखिरकार सरकार को क्यों झुकना पड़ा

आज के समय में जिस तरह आधुनिकता की आड़ में जंगल व जीवों को नुकसान पहुंच रहा है. आने वाले समय में इसके दुष्परिणामों से इंकार नहीं किया जा सकता. 70 के दशक में जंगल को बचाने की मुहिम ने ऐसी क्रांति का रूप ले लिया,

जो हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गई. इस आंदोलन की चंडीप्रसाद भट्ट व गौरा देवी की ओर से की गई थी व हिंदुस्तान के मशहूर सुंदरलाल बहुगुणा ने आगे इसका नेतृत्व किया. इस आंदोलन में पेड़ों को काटने से बचाने के लिए गांव के लोग पेड़ से चिपक जाते थे, इसी वजह से इस आंदोलन का नाम ‘चिपको आंदोलन’ पड़ा था.

आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा 
चिपको आंदोलन की आरंभ प्रदेश के चमोली जिले में गोपेश्वर नाम के एक जगह पर की गई थी. आंदोलन वर्ष 1973 में शुरु हुई जंगलों की अंधाधुंध व गैरकानूनी कटाई को रोकने के लिए प्रारम्भ किया गया. इस आंदोलन में स्त्रियों का भी खास सहयोग रहा व इस दौरान कई नारे भी प्रसिद्ध हुए व आंदोलन का भाग बने. इस आंदोलन में वनों की कटाई को रोकने के लिए गांव के पुरुष व महिलाएं पेड़ों से लिपट जाते थे व ठेकेदारों को पेड़ नहीं काटने दिया जाता था. जिस समय यह आंदोलन चल रहा था, उस समय केन्द्र की पॉलिटिक्स में भी पर्यावरण एक एजेंडा बन गया थाय इस आन्दोलन को देखते हुए केन्द्र सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम बनाया.
इस अधिनियम के तहत वन की रक्षा करना व पर्यावरण को जीवित करना है. बोला जाता है कि चिपको आंदोलन की वजह से वर्ष 1980 में तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी ने एक विधेयक बनाया था. इस विधेयक में हिमालयी क्षेत्रों के वनों को काटने पर 15 वर्षों का प्रतिबंध लगा दिया था. चिपको आंदोलन न सिर्फ उत्तराखंड में बल्कि सारे देश में फैल गया था. आज भी यह आंदोलन सुनहरे अक्षरों में इतिहास में दर्ज है. जिस तरह ग्रामीणों में पेड़ों के कटाव को रोकने के लिए हौसला दिखाई थी, उसे पूरी संसार सलाम करती है.