कोविड-19 के दौरान लोगों की मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा यह प्रभाव

कोविड-19 के दौरान लोगों की मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा यह प्रभाव

पश्चिम बंगाल में कोविड-19 से अच्छा हो चुके कई लोग अकेलेपन व परिजनों, पड़ोसियों की बेरुखी के कारण अवसाद का सामना कर रहे हैं । कोलकाता में एक सरकारी अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक ने इस बारे में बताया है. 

बेलियाघाट इलाके में आईडी एंड बीजी अस्पताल में कोविड-19 से अच्छा हो चुके मरीजों के लिए चलाये जा रहे क्लीनिक के प्रभारी संजीव बंदोपाध्याय ने बताया कि संक्रमण से उबर चुके कुछ मरीजों के आवास को पड़ोसी 'कोरोना फ्लैट या 'कोरोना घर कहते हुए दूसरों को दूर रहने के लिए आगाह करते हैं . 
         

डाक्टर बंदोपाध्याय ने बोला कि कोलकाता में कुछ लोगों को पड़ोसियों ने घरों में घुसने नहीं दिया तो ऐसे लोगों को गृह स्थानों पर लौटना पड़ा. अच्छा हो चुके लोगों के परिवार वालों ने जाँच के लिए खून के नमूने लेने पहुंचे लोगों को भी इन्कार कर दिया .
विशेषज्ञों का बोलना है कि महामारी के कारण कई-कई दिनों तक घरों में ही रहने से कई लोगों की मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ा है.
         
विशेषज्ञों के मुताबिक लोग बैचेनी-घबराहट, व्यवहार में परिवर्तन, नींद में बाधा, लाचारी व आर्थिक परेशानियों के कारण अवसाद का सामना कर रहे हैं । असम सरकार के एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि प्रदेश के मरीज भी कई तरह की मानसिक समस्या का सामना कर रहे हैं । खास कर जॉब समाप्त होने, वित्तीय दबाव व सामाजिक तौर पर लांछन से मनोदशा पर गहरा प्रभाव पड़ा है व इसके लिए परामर्श की आवश्यकता है . 
         
एक सर्वेक्षण के मुताबिक, 97 फीसदी लोगों ने बोला कि उनकी नींद उचट गयी है व 12 फीसदी ने बोला कि घबराहट, बैचैनी की उन्हें परेशानी होती है । सर्वेक्षण के अनुसार, सात फीसदी लोगों ने बोला कि सामाजिक लांछन से वह दबाव का सामना कर रहे हैं . 
         
डाक्टर बंदोपाध्याय ने कहा, ''कोविड-19 से अच्छा हो चुके तकरीबन सौ फीसदी लोग पड़ोसियों व परिजनों द्वारा अलग-थलग छोड़ दिए जाने के कारण अवसाद का सामना कर रहे हैं. संक्रमण से अच्छा हो चुके लोगों को परामर्श के लिए आईडी एंड बीजी अस्पताल में करीब एक महीने से क्लीनिक चलाया जा रहा है .
         
डाक्टर बंदोपाध्याय ने कहा, ''ठीक होने वाले करीब 60 फीसदी लोगों ने हमसे परामर्श लिया है व सबने एक ही तरह के अनुभव बयां किए हैं कि वे समाज में अलग-थलग पड़ चुके हैं. समाज उन्हें स्वीकार नहीं रहा. इससे उन पर गहरा मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ा है.